6.) गलियाँ इश्क की गीली हो गयी,
चल आजा मिल के फिसलते हैं !
7.) अब क्या चाँद तोड़ के लाये,
हम बड़े कामचोर हैं....इश्क भी करते हैं तो आराम से !
8.) उसके चाय पुछने का अंदाज इतना मिठा था,
कि चाय हीं फीकी लगने लगी !
9.) यूँ ना जाओ तोहमत लगा के,
कुछ तो कहो सोहवत में आ के !
10.) जब महफ़िलों में खामोशियों की सर्दी बढती है,
तब मेरी शायरी की मफलर कानो पर पड़ती है !
सुना बैठे किस्सा मेरी बेवफाई का
ReplyDeleteअपने ही शहर के किसी महफ़िल में
वो जो कभी खुश हो जाते थे
सुन के धडकन अपने मेरे दिल में
अधृत
खूब कही....:)
Deleteजब महफ़िलों में खामोशियों की सर्दी बढती है,
ReplyDeleteतब मेरी शायरी की मफलर कानो पर पड़ती है !
अच्छा प्रयास है आपका शायरी करने का .....यूं ही लिखते रहिये
शुक्रिया केवल राम जी.......:)
Deleteआज के ज़माने का प्रेम। एकदम नए टाइप का।
ReplyDeleteउसके चाय पुछने का अंदाज इतना मिठा था,
ReplyDeleteकि चाय हीं फीकी लगने लगी ..
वाह ... क्या बात है ... क्या अंदाज़ है उनका ... मज़ा आ गया ...
बहुत सुन्दर.......
ReplyDeleteइन्हें नन्ही नन्हीं क्षणिकाये कहूँगी मैं तो.....
बहुत खूबसूरत भाव हैं दीपांशु जी.
अनु
उम्दा अंदाज . वाह! बहुत खूब..
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