Tuesday, 10 July 2012



6.) गलियाँ इश्क की गीली हो गयी,
     चल आजा मिल के फिसलते हैं !


7.) अब क्या चाँद तोड़ के लाये,
     हम बड़े कामचोर हैं....इश्क भी करते हैं तो आराम से !


8.) उसके चाय पुछने का अंदाज इतना मिठा था,
      कि चाय हीं फीकी लगने लगी !


9.) यूँ ना जाओ तोहमत लगा के,
     कुछ तो कहो सोहवत में आ के !


10.) जब महफ़िलों में खामोशियों की सर्दी बढती है,
       तब मेरी शायरी की मफलर कानो पर पड़ती है !


8 comments:

  1. सुना बैठे किस्सा मेरी बेवफाई का
    अपने ही शहर के किसी महफ़िल में
    वो जो कभी खुश हो जाते थे
    सुन के धडकन अपने मेरे दिल में
    अधृत

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  2. जब महफ़िलों में खामोशियों की सर्दी बढती है,
    तब मेरी शायरी की मफलर कानो पर पड़ती है !

    अच्छा प्रयास है आपका शायरी करने का .....यूं ही लिखते रहिये

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    1. शुक्रिया केवल राम जी.......:)

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  3. आज के ज़माने का प्रेम। एकदम नए टाइप का।

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  4. उसके चाय पुछने का अंदाज इतना मिठा था,
    कि चाय हीं फीकी लगने लगी ..

    वाह ... क्या बात है ... क्या अंदाज़ है उनका ... मज़ा आ गया ...

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  5. बहुत सुन्दर.......
    इन्हें नन्ही नन्हीं क्षणिकाये कहूँगी मैं तो.....
    बहुत खूबसूरत भाव हैं दीपांशु जी.

    अनु

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  6. उम्दा अंदाज . वाह! बहुत खूब..

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